अभिलाषा

अकेलापन जब खाये जाता है भीड़ में तो वापस लौट जाने का जी करता है याद सफर की सताती है तो फिर से नदी बन जाने का जी करता है पर ज़मीन दिखने लगती है मुझे अस्तितव खो जाने का डर सताने लगता है किनारे पर न जाने कितने थपेड़े मारे उस अतीत के तट … Continue reading अभिलाषा