अभिलाषा

अकेलापन जब खाये जाता है भीड़ में
तो वापस लौट जाने का जी करता है
याद सफर की सताती है तो फिर से
नदी बन जाने का जी करता है
पर ज़मीन दिखने लगती है मुझे
अस्तितव खो जाने का डर सताने लगता है किनारे पर
न जाने कितने थपेड़े मारे उस अतीत के तट पर
मगर विलुप्त हो जाता हूँ बारमबार
रेत की गहराईयों में
फिर बढ़ता हूँ आगे इक आस लिए मन में
रेत के सागर में इक दरिया बनाने की तमन्ना लिए
एक राह ढूंढता फिरता हूँ फिर बालक हो जाने को
फिर नदी बन जाने को
एक निकास ढूंढता हूँ इस एकाकी असिमता से
पर थक किनारे गिर जाया करता हूँ
शायद अब बूढ़ा हो गया हूँ मैं
एक बार फिर बचपन की गोद में दौड़ जाने का मन होता है
मंज़िल का दामन छुड़ा आगाज़ की ओर सफर पर
कूच कर जाने का मन होता है
फिर से वही मासूम शुरुआत हो फिर
कल कल करते बह निकलूं हिमालय की कोख से
फिर तराश किसी पत्थर को भगवान बना दूँ मैं
फिर तर कर किसी माँ का आँचल
ममता की खुशबू से झूम जाऊँ मैं
फिर पैर पखारूँ किसी काशी की और
जगाऊँ सोते हुए अनगिनत घाटों को
फिर कोई कान्हा आये तट पर मेरे
रास रचाये धुन पर अपनी बांसुरी के
चश्मदीद किसी कुंवर सिंह के वीर रास का बन जाऊँ
समेट लूँ अपने अंदर सालों साल जीवन के उनके
सिमट गयी सब चाह अभिलाषा नश्वर शरीर राख में जिनके
फिर गाये कोई ग़ालिब तट पर कोई राँझा गुजरे मजधार से
फिर से संगम हो गुजरने का दिल करता है
जहाँ कई बिछुड़े यार मिले
जो सागर में आ कर खो से गए हैं
पर कौन अब इतनी जुस्तजू करे ?
अब थक सा गया हूँ मैं शायद बूढ़ा हो गया हूँ
बस यादों का पल्लू पकड़ सो जाता हूँ अब सागर के गर्भ में
लहर बन इतराने की मेरी उम्र ना रही
शायद अब बूढ़ा हो गया हूँ मैं

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