माँ 

जब रूठ कर सिमट बैठ जाता हूँ कोने में  चुपके से अंधेरे में आकर मना लेती हो माँ ।। किसी की नज़र ना लग जाए तुम्हारे लख्त ए जिगर को रात की कालिख़ से काजल का टीका लगा देती हो माँ ।। तप जाए शरीर थोड़ा, कि मामूली सी मर्ज हो बैठे बैठे हीं रातें … Continue reading माँ 

कागज़ की कश्ती 

बहुत साल पहले इक नाव बनाई थी मैंने   घर के पिछवारे जो दरिया बन बह रहा था सावन उस दरिया में एक नाव बहाई थी मैंने आज खोल कर बैठा था किताब ज़िदगी की इक पन्ना फटा मिला बचपन का कुछ यादें कुछ एहसास छोटी छोटी आयतें खुशियों की माँ की लोरीयाँ कहानीयाँ बाबा … Continue reading कागज़ की कश्ती